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Wah Bhi Koi Desh Hai Maharaj

Anil Yadav

Onverkort 9789356048539
7 uur 35 minuten
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Van de uitgever

यह यात्रावृतांत मात्र पूवोतर की दशा का ही वर्णन नही करता है| जहाँ बेरोजगारी की मार है| जिसके कारण लोग वहाँ से पलायन कर रहे हैं| इसलिए इन विचारों के आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि यह यात्रावृताांत नस्ल-अंतर, भाषा-अंतर तथा संस्कृति के अंतर की द्वन्द यात्रा है| जिसे अनिल यादव ने भोगा है और उसे हमारे समक्ष प्रकट किया है| पूर्वोत्तर को घनीभूत-मूलभूत उद्घाटित करते हुए अनिल यादव ने हिन्दी के पाठकों को एक वृहत्तर भारत देखने वाली नज़र दी है। पूर्वोत्तर देश का उपेक्षित और अर्धज्ञात हिस्सा है, उसको महज सौन्दर्य के लपेटे में देखना अधूरी बात है। अनिल यादव ने कंटकाकीर्ण मार्गों से गुज़रते हुए सूचना और ज्ञान, रोमांच और वृत्तांत, कहानी और पत्रकारिता शैली में इस अनूठे ट्रैवलॉग की रचना की है।'मैं छाती ठोंककर कहता हूं. हिंदी में इस तरह की दूसरी कोई किताब नहीं लिखी गई. न जबान के मामले में, न जान के मामले में. अगर आपने ये किताब नहीं पढ़ी है तो फौरन इंटी-गुलंटी बांध लो. और तभी खोलना, जब खोजकर, खरीदकर पढ़ लो.' सौरभ द्विवेदी (एडिटर- दी लल्लनटॉप)
Van de uitgever
यह यात्रावृतांत मात्र पूवोतर की दशा का ही वर्णन नही करता है| जहाँ बेरोजगारी की मार है| जिसके कारण लोग वहाँ से पलायन कर रहे हैं| इसलिए इन विचारों के आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि यह यात्रावृताांत नस्ल-अंतर, भाषा-अंतर तथा संस्कृति के अंतर की द्वन्द यात्रा है| जिसे अनिल यादव ने भोगा है और उसे हमारे समक्ष प्रकट किया है| पूर्वोत्तर को घनीभूत-मूलभूत उद्घाटित करते हुए अनिल यादव ने हिन्दी के पाठकों को एक वृहत्तर भारत देखने वाली नज़र दी है। पूर्वोत्तर देश का उपेक्षित और अर्धज्ञात हिस्सा है, उसको महज सौन्दर्य के लपेटे में देखना अधूरी बात है। अनिल यादव ने कंटकाकीर्ण मार्गों से गुज़रते हुए सूचना और ज्ञान, रोमांच और वृत्तांत, कहानी और पत्रकारिता शैली में इस अनूठे ट्रैवलॉग की रचना की है।'मैं छाती ठोंककर कहता हूं. हिंदी में इस तरह की दूसरी कोई किताब नहीं लिखी गई. न जबान के मामले में, न जान के मामले में. अगर आपने ये किताब नहीं पढ़ी है तो फौरन इंटी-गुलंटी बांध लो. और तभी खोलना, जब खोजकर, खरीदकर पढ़ लो.' सौरभ द्विवेदी (एडिटर- दी लल्लनटॉप)
Publicatiedatum
20-11-2020

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