HARI
Abhijeet Mukesh
Completo
•
9789353811792
51 minutos
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De la editorial
बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न तो सब मनाते हैं लेकिन उस जीत के लिए किसी ने कितना संघर्ष किया है उसे हम भूल जाते हैं. लेकिन कुछ भूल जाने की सज़ा कितनी बड़ी हो सकती है? क्या हमारा अतीत, उसे भूल जाने का बदला लेने हमारे वर्तमान में आकर खड़ा हो सकता है? क्या जीत का जश्न मनाने का अधिकार पाने के लिए हमें फिर से संघर्ष करना पड़ सकता है? ऐसे ही कुछ सवालों में उलझी कहानी है, हरी. अच्छाई पर बुराई की जीत की नहीं बल्कि उनके बीच के संघर्ष की कहानी है, हरी. कौन जीतेगा? कौन हारेगा? यह तो बाद में तय होगा लेकिन पहले हरी को तय करना होगा कि वो अपने अतीत से लड़ेगा या अपने पूर्वजों की तरह गुमनामी में ही कहीं खो जाएगा?